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[SAVE THE NATURE] प्रकृति माँ का प्यार

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" वन्य जीव मनुष्यों के क्षेत्रों में स्वछंद होकर विचरण कर रहा है मानो कह रहा हो कि "आली रे आली ,आता माझी बारी आली" । पांच तत्वों का हाल देखिये जिनसे हम बने हैं और जो प्रकृति माँ हमें देकर जीवन के चक्र को चलाती जा रही थीं आज हमने  उन्हें प्रदूषित करके उनको ही व्यवसाय बना दिया है। छोटे कदम ही सही  लेकिन जब अरबों छोटे कदम बढ़ेंगे तो परिणाम का अंदाजा हम लगा सकते हैं। " हिमालय की चोटियाँ अब फिर  से दृष्टिगोचर होने लगी हैं ,नदियों का पानी साफ़ होने लगा है। सांस लेने में सहजता  का आभास होने लगा है ,गगन भी अब पहले से साफ़  दिखाई दे रहा है धुंध और धुएं का फर्क नज़र आने लगा है । वन्य जीव मनुष्यों के क्षेत्रों में स्वछंद होकर विचरण कर रहा है मानो कह रहा हो कि "आली रे आली ,आता माझी बारी आली" । जैसे कल तक हम उनके क्षेत्रों  में विचरण किया करते थे। Himalayan Beauty ,the Serenity ,River Tista क्या ये कुछ अलग है,चमत्कार है या जादू है ? नहीं ये तो पहले से था ये तो माँ प्रकृति का सुन्दर रूप था जिसे हमारी महत्वाकांक्षाओं की गर्द ने इस तरह ढक दिया कि ...

तीस्ता का सौंदर्य [Hindi Poem on River]

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ये कविता समर्पित है सिक्किम की सुन्दर घाटियों के बीच से निकलती तीस्ता नदी के लिए ,नदी जिसे हमारे देश में माँ का दर्जा  देते हैं क्योंकि ये निस्वार्थ होकर हम सबका ख्याल रखती है। जहाँ से ये गुज़रती हैं वह सब हरा भरा बना देती हैं। सबकी प्यास बुझाती हुई ,पंछियों के कलरव को जीवित  रखती हुई ,किसानो की थकावट मिटाके उनकी मेहनत को उनके चेहरे की हसीं बनाती हुई बहती है। जब मैंने तीस्ता माँ को उन घुमावदार और विषम रास्तों से स्वच्छंदता से बहते हुए देखा तब ऐसा लगा  तुम बस अपने आपको बिना बदले अडिगता से बढ़ते रहो रास्ते कैसे भी हो मंज़िल आपकी आपको ज़रूर मिलेगी।   लेकिन इस कविता में मैंने उनके सौंदर्य और मनभावन गुणों को शब्दों में उकेरने की कोशिश की है।   अगर आपको महसूस हो तीस्ता माँ का ममता भरा बहाव तो सूचित अवश्य करें।  दिनकर जैसे ओज से निकली ,वो मस्ती और मौज से निकली।  बहती तीस्ता लगती जैसे ,बेटी पिता की गोद से निकली।  बलखाती ,इतराती ,इठलाती ,अविरल बहती जाती।  चलो मेरे संग मस्ती भरके ,जैसे  कहती जाती।  कही...